CM बीरेन सिंह पर इस्तीफे का दबाव क्यों, राज्य में जारी सियासी सरगर्मी के मायने क्या? जानें सबकुछ

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पिछले तीन मई से मणिपुर हिंसा की आग में झुलस रहा है। तमाम कोशिशों के बावजूद बीरेन सिंह इसे रोक पाने में अब तक असफल रहे हैं। इसके चलते भाजपा पर बीरेन सिंह को मुख्यमंत्री पद से हटाने के लिए राजनीतिक दबाव बढ़ रहा है।

मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह के इस्तीफे की अटकलें शुक्रवार को पूरे दिन लगती रहीं। शाम होते-होते बीरेन सिंह ने ट्वीट करके इस्तीफे की अटकलों को खारिज कर दिया। इससे पहले उनके घर के बाहर मुख्यमंत्री के समर्थकों ने जमकर हंगामा किया। बीरेन सिंह के इस्तीफे की फटी हुई कॉपी भी सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। 


ये पहली बार नहीं जब बीरेन सिंह के इस्तीफे को लेकर इस अकटकले लग रही हैं। आइये जानते हैं कि आखिर कब-कब बीरेन सिंह को मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने की चर्चा रही? इस बार बीरेन सिंह के इस्तीफे की बात क्यों सामने आई? उनके इस्तीफे को लेकर शुक्रवार को दिनभर क्या हुआ? आगे मणिपुर में क्या हो सकता है? केंद्र सरकार क्या करेगी? राज्य में राजी हिंसा की वजह क्या है?  

पहले कब-कब हुई बीरेन सिंह के मुख्यमंत्री पद से हटने की चर्चा?
बीरेन सिंह 2015 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा आए। दो साल बाद राज्य में चुनाव हुए और भाजपा सत्ता में आ गई। बीरेन सिंह को मुख्यमंत्री बनाया गया। 2022 में एक बार फिर भाजपा ने सत्ता में वापसी की। हालांकि, चुनाव जीतने के बाद अटकलें लगने लगीं कि भाजपा असम की तरह मणिपुर में भी किसी नए चेहरे को मुख्यमंत्री बना सकती है। हालांकि, ऐसा नहीं हुआ। बीरेन सिंह को ही दोबारा राज्य की कमान मिली। 

बीते अप्रैल में एक बार फिर बीरेन सिंह को हटाए जाने को लेकर खबरें मीडिया में आने लगीं। कहा गया कि उनकी पार्टी के विधायक ही उनके खिलाफ हैं। कई विधायकों ने सरकारी पदों से इस्तीफा दे दिया तो इन अटकलों को और बल मिला। लेकिन, बीरेन सिंह इसके बाद भी बने रहे। 

पिछले दो महीने से मणिपुर हिंसा की आग में झुलस रहा है। एक बार फिर मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह पर पद छोड़ने का दबाव है। शुक्रवार को राज्यपाल अनुसुइया उइके से उनकी मुलाकात की खबर आते ही चर्चा शुरू हो गई की मुख्यमंत्री इस्तीफा दे सकते हैं। इसके पहले रविवार को उन्होंने गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात की थी। 

गृह मंत्री अमित शाह ने शनिवार को मणिपुर के हालात को लेकर 18 पार्टियों के साथ सर्वदलीय बैठक की थी। बैठक में सपा और राजद ने मणिपुर के सीएम एन बीरेन सिंह के इस्तीफे की मांग की थी। इसके अलावा सूबे में राष्ट्रपति शासन लगाने की भी मांग की गई थी। इसी वजह से इन अटकलों को और बल मिला। 

इस बार बीरेन सिंह पर इस्तीफा का इतना दबाव क्यों है? 
पिछले तीन मई से मणिपुर हिंसा की आग में झुलस रहा है। तमाम कोशिशों के बावजूद बीरेन सिंह इसे रोक पाने में अब तक असफल रहे हैं। इसके चलते भाजपा पर बीरेन सिंह को हटाने के लिए राजनीतिक दबाव बढ़ रहा है। ऐसी भी खबरें आईं कि जब गृहमंत्री अमित शाह और बीरेन सिंह के बीच मुलाकात हुई थी, तब उन्हें कहा गया कि वह या तो अपना इस्तीफा दे दें या फिर केंद्र सरकार अब पूरी तरह से हस्तक्षेप करेगी।  

अगर बीरेन सिंह का इस्तीफा हुआ तो राज्य की सत्ता में क्या होगा?
60 सदस्यीय मणिपुर विधानसभा में भाजपा के 37 विधायक हैं। सहयोगियों समेत सत्ताधारी गठबंधन के पास कुल 42 विधायकों का समर्थन है। ऐसे में अगर भाजपा चाहे तो राज्य में नेतृत्व परिवर्तन कर सकती है। किसी नए चेहरे को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है। हालांकि, हालात को देखते हुए  केंद्र के पास राष्ट्रपति शासन लागू करने का भी विकल्प है। इस तरह की अटकलें भी हैं कि केंद्र इस बारे में विचार कर रहा है। 

ताजा सियासी उथलपुथल के पीछे की वजह?
इसे समझने के लिए हमने थोड़ा मणिपुर का बैकग्राउंड और जातीय समीकरण समझना होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि मणिपुर में इन दिनों जो कुछ भी हो रहा है वह इसी के चलते हो रहा है। तो आइए शुरू करते हैं…. 

मणिपुर की राजधानी इम्फाल बिल्कुल बीच में है। ये पूरे प्रदेश का 10% हिस्सा है, जिसमें प्रदेश की 57% आबादी रहती है। बाकी चारों तरफ 90% हिस्से में पहाड़ी इलाके हैं, जहां प्रदेश की 43% आबादी रहती है। इम्फाल घाटी वाले इलाके में मैतेई समुदाय की आबादी ज्यादा है। ये ज्यादातर हिंदू होते हैं। मणिपुर की कुल आबादी में इनकी हिस्सेदारी करीब 53% है। आंकड़ें देखें तो सूबे के कुल 60 विधायकों में से 40 विधायक मैतेई समुदाय से हैं।

वहीं, दूसरी ओर पहाड़ी इलाकों में 33 मान्यता प्राप्त जनजातियां रहती हैं। इनमें प्रमुख रूप से नगा और कुकी जनजाति हैं। ये दोनों जनजातियां मुख्य रूप से ईसाई हैं। इसके अलावा मणिपुर में आठ-आठ प्रतिशत आबादी मुस्लिम और सनमही समुदाय की है। 

भारतीय संविधान के आर्टिकल 371C के तहत मणिपुर की पहाड़ी जनजातियों को विशेष दर्जा और सुविधाएं मिली हुई हैं, जो मैतेई समुदाय को नहीं मिलती। ‘लैंड रिफॉर्म एक्ट’ की वजह से मैतेई समुदाय पहाड़ी इलाकों में जमीन खरीदकर बस नहीं सकता। जबकि जनजातियों पर पहाड़ी इलाके से घाटी में आकर बसने पर कोई रोक नहीं है। इससे दोनों समुदायों में मतभेद बढ़े हैं।

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